Friday, December 21, 2018

परमेश्वर की लीलाए - 4

सत्संग से मिली भक्ति की राह


संत नित्यानंद जी की कथा

संत नित्यानंद जी का बचपन का नाम नंदलाल था। वे ब्राह्मण कुल में जन्मे थे। संत गरीबदास जी (गाँव छुड़ानी जिला-झज्जर) के कुछ समय समकालीन थे। संत गरीबदास जी का जीवन सन् 1717-1778 तक रहा था। उस समय ब्राह्मणों का विशेष सम्मान किया जाता था। सर्वोच्च जाति मानी जाती थी। जिस कारण से गर्व का होना स्वाभाविक था। नंदलाल जी के माता-पिता का देहांत हो गया था। उस समय वे 7-8 वर्ष के थे। आप जी के नाना जी नारनौल के नवाब के कार्यालय में उच्च पद पर विराजमान थे। आप जी का पालन-पोषण नाना-नानी जी ने किया। शिक्षा के उपरांत नाना जी ने अपने दोहते नंदलाल को नारनौल में तहसीलदार लगवा दिया। एक तो जाति ब्राह्मण, दूसरे उस समय तहसीलदार का पद। जिस कारण से अहंकार का होना सामान्य बात है। तहसीलदार जी का विवाह भी नाना-नानी ने कर दिया था। तहसीलदार जी के महल से थोड़ी दूरी पर एक वैष्णव संत श्री गुमानी दास जी अपने किसी भक्त के घर सत्संग कर रहे थे। वे श्री विष्णु जी के भक्त थे। सर्व संत जन अपने सत्संग में परमात्मा कबीर जी की अमृतवाणी का सहयोग अवश्य लेते थे। सत्संग में बताया गया कि मानव जीवन किसलिए प्राप्त होता है, परंतु सत्संग न सुनने के कारण सांसारिक उठा-पठक में अपना अनमोल मानव जीवन नष्ट कर जाता है। अज्ञान के कारण जीव धन, पद तथा जाति का अभिमान करता है। भक्ति न करने वाला प्राणी अगले जन्म में गधे-कुत्ते, बैल आदि पशु-पक्षियों के शरीर में कष्ट उठाता है। इसलिए अभिमान त्यागकर पूर्ण संत से दीक्षा लेकर अपना कल्याण करवाना चाहिए। अन्यथा पर्वत से भारी कष्ट भोगना पड़ेगा।
स्वामी गुमानी दास जी का आश्रम नारनौल शहर से लगभग डेढ़ (1)) किमी. पर था। सत्संग की आवाज सुनकर तहसीलदार मकान की छत पर कुर्सी लेकर बैठ गया। पूरा सत्संग सुना। दीक्षा लेने की प्रबल प्रेरणा बन गई, परंतु जाति और पद का अहंकार परेशान कर रहा था। ब्राह्मणों की कितनी इज्जत है। फिर मैं तहसीलदार हूँ। सत्संग में सामान्य लोग जाते हैं। मुझे शर्म लगेगी। कैसे जाऊँगा आश्रम में? अंत में एक दिन निर्णय लिया कि सुबह वक्त से आश्रम में पहुँच 
जाऊँगा। अन्य व्यक्ति जाऐंगे, तब तक तो दीक्षा लेकर लौट आऊँगा। सत्संग करके संत जी आश्रम में चले गए। सुबह उठकर कुछ देर सैर करते थे। एक दिन नंदलाल जी घोड़े पर बैठकर सुबह आश्रम की ओर जा रहे थे। गुमानी दास जी सैर के  ए उसी रास्ते पर जा रहे थे। संत जी ने सिर के बाल कटा रखे थे, उस्तरा फिरा रखा था। सिर पर कोई वस्त्रा नहीं था। नंदलाल जी ब्राह्मण होने के नाते सौंण-कसौंण पर विश्वास रखते थे। किसी अच्छे कार्य के लिए जाते और आगे से कचकोल काढ़े (सिर पर उस्तरा फिराऐ) कोई आ जाता तो अपना जाना रद्द कर देते थे। आश्रम में दीक्षा लेने जा रहे थे, जिंदगी का सर्वोत्तम दिन था। आगे से सिर पर उस्तरा फिराए एक व्यक्ति मिल गया। नंदलाल जी का माथा ठनका और क्रोध आया। विचार किया कि आज दीक्षा का अवसर नहीं छोड़ना है, परंतु अपने सौण-कसौण को भी निस्क्रिय करना था। इसलिए अपने आप समाधान निकाल लिया कि इस मनहूस के सिर में टोला (हाथ की एक ऊँगली का उल्टा भाग) मार देता हूँ, कसौण समाप्त हो जाएगा। इसी उद्देश्य से घोड़ा उस व्यक्ति (संत गुमानी दास जी) के पास जाकर रोका और कहा कि हे कम्बख्त! तूने आज ही सिर मुंडवाकर मेरे सामने आना था। आज मैं अपनी जिंदगी के सबसे उत्तम कार्य के लिए आश्रम में जा रहा था। यह कहकर गुमानी दास जी के सिर पर टोले मारे और घोड़ा आश्रम की ओर चला दिया। संतो के साथ ऐसी घटनाऐं आम होती हैं। वे अधिक ध्यान नहीं देते। विचार तो किया कि व्यक्ति सभ्य तथा कोई उच्च अधिकारी तथा उच्च कुल का लग रहा था, कार्य पालियों वाले कर गया। नंदलाल आश्रम में गया। वहाँ संत के शिष्य मिले, राम-राम हुई। आने का कारण बताया। घोड़ा वृक्ष से बाँध दिया और संत जी के आसन के पास बिछी बोरी पर बैठ गया। संत गुमानी दास जी सैर के पश्चात् स्नान करके आसन पर बैठे तो घोड़ा देखा। फिर समझते देर न लगी। नंदलाल जी को देखा तो शर्म के मारे नीची गर्दन कर ली। गुमानी दास को आश्रम के भक्तों ने बता दिया था कि यह तहसीलदार जी दीक्षा लेने आए हैं। नंदलाल जी संत के चरणों में गिर गए और टोला मारने का कारण बताया। संत गुमानी दास जी ने कहा कि हे भक्त! जब हम एक आन्ने का घड़ा कुम्हार के पास से लेने जाते हैं तो उसको टोले मार-मारकर बजाकर जाँचते हैं कि कहीं फूटा तो नहीं है। आप जी तो जिंदगी का सौदा करने आए हो, आपने गुरू जी बजाकर देख लिया तो कोई पाप नहीं किया। नितानंद जी संत जी के शीतल स्वभाव से और भी अधिक प्रभावित हुए। दीक्षा ले ली। संत गुमानी दास जी ने उनका नाम बदलकर नित्यानंद रख दिया। जब सत्संग से जीने की राह मिली तो नितानंद जी ने वाणी बोली:-

ब्राह्मण कुल में जन्म था, मैं करता बहुत मरोड़।
गुरू गुमानी दास ने, दिया कुबुद्धि गढ़ तोड़।।

फिर कितने आधीन हुए, वह इस वाणी से पता चलता है:-
सिर सौंपा गुरूदेव को, सफल हुआ यह शीश।
नित्यानंद इस शीश पर, आप बसै जगदीश।।

भावार्थ:- जब तक सत्संग के विचार सुनने को नहीं मिलते तो भूलवश मानव अहंकार में सड़ता रहता है। जब ज्ञान होता है कि आज राज है, मृत्यु उपरांत गधा, कुत्ता बनेगा तो इस अहंकार का क्या बनेगा? इसलिए भक्त अपने उस अड़ंगे को
ज्ञान से साफ करके भक्ति पथ पर चलते हैं और सफलता प्राप्त करते हैं। श्रीलंका के राजा रावण ने भक्ति बहुत की, परंतु अहंकार नहीं गया। जिस कारण से विनाश को प्राप्त हुआ। रावण भी ब्राह्मण था। नित्यानंद जी भी ब्राह्मण थे। सत्संग सुनकर निर्मल हो गए। रावण को सत्संग सुनने को नहीं मिला। जिस कारण से जीवन व्यर्थ गया और अमिट कलंक भी लग गया। नित्यानंद जी ने कहा कि मेरा जन्म ब्राह्मण कुल में होने के कारण जाति अभिमान के कारण पूर्ण मरोड़ (अहंकार) करता था। जब गुरू जी गुमानी दास जी के सत्संग वचन सुने तो जाति का अहंकार रूपी कुबुद्धि का गढ़ समाप्त हो गया। जीवन सफल हुआ। 

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परमेश्वर की लीलाए - 3

राजा परीक्षित का उद्धार


जस समय राजा परीक्षित को ऋषि के शाॅपवश तक्षक सर्प ने डसना था तो राजा परीक्षित जी के उद्धार के लिए श्रीमद् भागवत (सुधा सागर) की सात दिन की कथा करनी थी। पृथ्वी के सर्व ऋषियों तथा पंडितों से श्रीमद् भागवत की कथा परीक्षित को सुनाने का आग्रह किया गया। वे वास्तव में पंडित थे। वे परमात्मा के विधान को जानते थे। उनको यह भी पता था कि सातवें दिन परिणाम आएगा। विश्व के बुद्धिजीव व्यक्तियों की दृष्टि सातवें दिन परीक्षित का क्या होगा, इस पर टिकी थी। पृथ्वी के सर्व पंडितों ने श्रीमद् भागवत की कथा सुनाने से मना कर दिया तथा कह दिया कि हम अधिकारी नहीं हैं। हम किसी के मानव जीवन के साथ खिलवाड़ करके पाप के भागी नहीं बनेंगे। जिस वेदव्यास जी ने श्रीमद् भागवत को लिखा था, उसने भी कथा सुनाने से इंकार कर दिया। सब ऋषियों ने बताया कि स्वर्ग से ऋषि सुखदेव जी को इस कार्य के लिए बुलाया जाए। वे कथा सुनाने के अधिकारी हैं। राजा परीक्षित के लिए स्वर्ग से सुखदेव ऋषि को बुलाया गया। कुछ समय नरक भोगकर युद्धिष्ठिर स्वर्ग में पुण्य फल भोग रहा है। उसने वंश के मोहवश होकर अर्जुन के पौत्रा परीक्षित के उद्धार के लिए अपने कुछ पुण्यों को सुखदेव (शुकदेव) ऋषि को दान किया। उस पुण्यों की कीमत से श्री शुकदेव ऋषि जी विमान में बैठकर पृथ्वी पर परीक्षित राजा को श्रीमद् भागवत की कथा सुनाने आए। सात दिन कथा सुनाकर परीक्षित का राज तथा परिवार से मोह समाप्त किया। तक्षक सर्प ने परीक्षित को कथा के दौरान ही डसा। उसी समय राजा की मृत्यु हो गई। परंतु कथा सुनने से परीक्षित का ध्यान संसार से हटकर स्वर्ग के सुख में लीन था। राजा के पद पर रहते हुए परीक्षित जी ने बड़े-बड़े धर्म यज्ञ किए थे। जिस कारण से उनके पुण्यों का ढ़ेर लगा था। वाणी में परमात्मा का विधान बताया है कि:-
कबीर, जहाँ आशा तहाँ बासा होई। मन कर्म वचन सुमरियो सोई।।
गीता अध्याय 8 श्लोक 6 में भी यही प्रमाण है कि ‘‘हे भारत! परमात्मा का यह विधान है कि जो अन्त समय में जिसमें भाव यानि आस्था रखकर स्मरण करता है, वह उसी को प्राप्त होता है।’’ इसी विधानानुसार राजा परीक्षित का जीव स्थूल शरीर त्यागकर (जो सर्प विष से मर गया था) सूक्ष्म शरीर युक्त शुकदेव ऋषि के साथ विमान में बैठकर स्वर्ग में चला गया।
संत गरीबदास जी (गाँव-छुड़ानी, जिला-झज्जर) ने मनीराम जी को बताया कि शुकदेव ऋषि के द्वारा सुनाई कथा से राजा परीक्षित का मन संसार से हटकर स्वर्ग की प्राप्ति के लिए प्रेरित हो गया था। जिस कारण से मृत्यु के उपरांत उस जन्म में राज के दौरान किए पुण्यों के फलस्वरूप स्वर्ग चला गया। जन्म-मरण का चक्र अभी शेष है। काल ब्रह्म के लोक में स्वर्ग-महास्वर्ग (ब्रह्मलोक) प्राप्ति को ही उद्धार हुआ मानते हैं जो सम्पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान के टोटे का परिणाम है। काल ब्रह्म के लोक वाला उद्धार भी पृथ्वी के किसी ऋषि पंडित के स्तर का नहीं है क्योंकि इनका पाठ व कथा यानि सत्संग करने में मान-बड़ाई उद्देश्य रहता है। एक-दूसरे ऋषि के प्रति प्रसिद्धि की चाह में ईष्र्या रोग भी लगा रहता है। शुकदेव जी एक संत जनक जी के शिष्य थे। राजा जनक को पूर्ण परमात्मा कबीर जी मिले थे। उनको सोहं नाम जाप दिया था। राजा जनक के प्रमुख तथा प्रिय शिष्य शुकदेव जी थे। जनक जी ने यह मंत्रा केवल शुकदेव को दिया था। जिस कारण से शुकदेव का स्वर्ग समय अधिक है। राजा जनक के साथ काल ने धोखा किया था। उन्होंने अपने आधे पुण्य बारह करोड़ नरक भोग रहे जीवों को दान कर दिए थे। जिस कारण से उनका स्वर्ग समय कम रह गया था और वे सन् 1469 में पंजाब प्रान्त में (भारत देश में) श्री कालूराम महता (खत्राी-अरोड़ा) के घर श्री नानक नाम से जन्मे थे। (वर्तमान में पाकिस्तान देश में है।) शुकदेव जी को पृथ्वी पर किसी से कोई द्वेष तथा इष्र्या या मान-बड़ाई की चाह नहीं थी। उनके द्वारा सुनाई कथा का प्रभाव परीक्षित के मन पर पड़ा। जिस कारण से उनका स्वर्गवास हुआ। यदि अन्य ऋषि कथा करता तो राजा का मन राज व परिवार में रह जाता। उनका पुनः जन्म पृथ्वी पर होता। पुण्यों को राजा बनकर नष्ट करता।
संत गरीबदास जी ने बताया कि हे मनीराम! जब तक जीव का जन्म-मरण समाप्त नहीं होता तो उसको परम शांति नहीं होती। फिर राजा बनकर राज की हानि-लाभ की आग में जलता है। निर्धन बनकर कष्ट उठाता है। फिर पशु-पक्षी आदि-आदि के शरीरों में कष्ट उठाता है। आप श्री विष्णु उर्फ श्री कृष्ण जी के भक्त हो। (वैष्णव साधु श्री विष्णु जी को ईष्ट रूप में मानते हैं।) आप यह भी मानते हो कि श्री कृष्ण यानि श्री विष्णु जी ने श्रीमद्भगवत गीता का ज्ञान अर्जुन को सुनाया। गीता ज्ञान सुनाने वाला गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में स्पष्ट करता है कि मेरे से अन्य कोई परम ईश्वर है। हे भारत! तू सर्वभाव से उस परमेश्वर की शरण में जा। उस परमेश्वर की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परम धाम (सत्यलोक) को प्राप्त होगा।
गीता अध्याय 7 श्लोक 29 में गीता ज्ञान दाता ने बताया है कि ‘‘जो साधक जरा (वृद्धावस्था) तथा मरण (मृत्यु) से छुटकारा यानि मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील हैं। (काल लोक के राज्य तथा स्वर्ग-महास्वर्ग तक की इच्छा नहीं रखते।) वे तत् ब्रह्म से सम्पूर्ण अध्यात्म से तथा सर्व कर्मों से परिचित हैं। 
गीता अध्याय 8 श्लोक 1 में अर्जुन ने गीता ज्ञान देने वाले से प्रश्न किया कि जिस तत् ब्रह्म के विषय में अध्याय 7 के श्लोक 29 में कहा है कि वह तत् ब्रह्म क्या है? इसका उत्तर गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 8 के श्लोक 3 में दिया है।
बताया है कि वह परम अक्षर ब्रह्म है।

गीता अध्याय 8 के ही श्लोक 5 तथा 7 में गीता ज्ञान दाता ने अपनी भक्ति करने को कहा है जिससे मेरी प्राप्ति होगी और गीता के अध्याय 8 के श्लोक 8, 9, 10 में उस अपने से अन्य परम अक्षर ब्रह्म की भक्ति करने को कहा है जिससे उसकी प्राप्ति होती है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 12, अध्याय 4 श्लोक 5, अध्याय 10 श्लोक 2 में गीता ज्ञान बोलने वाले ने बताया है कि हे अर्जुन! तेरे और मेरे बहुत जन्म हो चुके हैं। आगे भी होते रहेंगे।
गीता अध्याय 2 श्लोक 17 में जो अविनाशी परमात्मा कहा है तथा अध्याय 15 श्लोक 16-17 में तीन पुरूष (प्रभु) बताए हैं। श्लोक 16 में क्षर पुरूष तथा अक्षर पुरूष का वर्णन है। दोनों नाशवान बताए हैं। फिर अध्याय 15 श्लोक 17 में अविनाशी परम अक्षर ब्रह्म की जानकारी बताई है। वह उत्तम पुरूष यानि सर्वश्रेष्ठ परमात्मा कहा है। वही तीनों लोकों का पालन-पोषण करता है, वास्तव में अविनाशी है। गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में गीता ज्ञान देने वाले ने स्पष्ट किया है कि तत्वदर्शी संत मिलने के पश्चात् परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के पश्चात् फिर लौटकर साधक संसार में कभी नहीं आते। उस परमात्मा की ही भक्ति करनी चाहिए जिससे संसार रूपी वृक्ष की प्रवृति विस्तार को प्राप्त हुई है यानि जिस परमात्मा ने विश्व की रचना की है।(गीता का उल्लेख समाप्त) 
संत गरीबदास जी ने मनीराम को बताया कि परम अक्षर ब्रह्म यानि तत् ब्रह्म की भक्ति मेरे (संत गरीबदास जी के) पास है। यदि आप जी को पूर्ण मोक्ष करवाना है तो दीक्षा लो और कल्याण करवा लो। मनीराज जी को गीता के सर्व श्लोक कण्ठस्थ थे। तुरंत समझ गए और दीक्षा लेकर पाखण्ड त्यागकर कल्याण करवाया।
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परमेश्वर की लीलाए - 2

वैश्या का उद्धार


परमेश्वर कबीर जी रात्रि में घर-घर में सत्संग करते थे। दिन में अपने निर्वाह के लिए सब श्रोता तथा कबीर जी कार्य करते थे।
एक रात्रि में सत्संग चल रहा था। थोड़ी दूरी पर काशी शहर की प्रसिद्ध वैश्या चम्पाकली का आलीशान मकान था। उस रात्रि में वैश्या को ग्राहकों का टोटा था। जिस कारण से इंतजार में जाग रही थी। उसको परमात्मा कबीर जी के मुख कमल से प्रिय अमृतवाणी सुनाई दी। सत्संग में बताया गया कि मानव (स्त्राी/पुरूष) का जीवन बड़े पुण्यों से प्राप्त होता है। जो स्त्राी-पुरूष भक्ति नहीं करते, दान-सेवा नहीं करते, वे परमात्मा के चोर हैं। (गीता अध्याय 3 श्लोक 12 में भी कहा कि जो व्यक्ति परमात्मा से प्राप्त धन का कुछ अंश दान-धर्म में लगाए बिना स्वयं ही पेट भरता रहता है, वह तो परमात्मा का चोर ही है।) जो मानव चोरी, डकैती, ठगी, वैश्यागमन करते हैं, वे महाअपराधी हैं। जो स्त्रिायाँ वैश्या का धंधा करती हैं, वे भी महाअपराधी हैं। परमात्मा के दरबार में उनको कठिन दण्ड दिया जाएगा। मानव जीवन शुभ कर्म करने तथा भक्ति करने के लिए प्राप्त होता है।
कबीर, चोरी जारी वैश्या वृति, कबहु ना करयो कोए।
पुण्य पाई नर देही, ओच्छी ठौर न खोए।।
मानव शरीर प्राप्त प्राणी को चाहिए कि सर्वप्रथम पूर्ण गुरू की शरण में जाकर दीक्षा प्राप्त करे। फिर आजीवन गुरू जी की मर्यादा में रहकर साधना तथा सेवा, दान-धर्म करता रहे। अपना दैनिक कार्य भी करे, परंतु सर्व बुराई त्याग दे। उसका कल्याण अवश्य होता है। अध्यात्म ज्ञान के अभाव से मानव (स्त्राी/पुरूष) केवल धन उपार्जन को अपना मुख्य लक्ष्य बनाकर जीवन सफर को तय करता है। यदि आपके पास अरब-खरब तक धन-संपत्ति है जो आपने पूरे जीवन में अट-पट, छल-कपट करके संग्रह की है। अचानक मृत्यु हो जाती है। सारे जीवन का जोड़ा धन तो यहीं रह गया, साथ तो शरीर भी नहीं गया, साथ गए तो वे पाप जो पूरे जीवन में माया के संग्रह में हुए थे।
काया तेरी है नहीं, माया कहाँ से होय।
गुरू चरणों में ध्यान रख, इन दोनों को खोय।।
भावार्थ:- जिस काया को रोगमुक्त कराने के लिए मानव अपनी संपत्ति को भी बेचकर उपचार कराता है। कहा है कि काया भी आपके साथ नहीं जाएगी, माया की तो बात ही क्या है। पूर्ण गुरू जी से दीक्षा लेकर दिन-रात्रि भक्ति कर। गुरू जी के बताए ज्ञान को आधार बनाकर जीवन की राह पर चल। काया तथा माया से मोह हटाकर भक्ति धन संग्रह कर।
कबीर, सब जग निर्धना, धनवंता ना कोय।
धनवान वह जानिये, जापे राम नाम धन होय।।
हे मानव! मानव का पिछला इतिहास देख ले।
सर्व सोने की लंका थी, रावण से रणधीरं।
एक पलक में राज नष्ट हुआ, जम के पड़े जंजीरं।।
भावार्थ:- श्रीलंका के राजा रावण के पास इतना धन था कि उसने सोने (स्वर्ण) के महल बना रखे थे। जब विनाश हुआ तो एक रती (ग्राम) स्वर्ण भी रावण साथ नहीं ले जा सका।
गरीब, भक्ति बिना क्या होत है, भ्रम रहा संसार।
रती कंचन पाया नहीं, रावण चली बार।।
भावार्थ:- संत गरीबदास जी ने भी इसी बात का समर्थन किया कि भक्ति बिना जीव को कोई लाभ नहीं होता। माया जोड़ने के लिए आजीवन भटकता रहता है। श्रीलंका के राजा रावण के पास अनन्त धन, स्वर्ण आदि था, परंतु संसार त्यागकर जाते समय एक ग्राम स्वर्ण भी साथ नहीं ले जा सका। सत्य भक्ति सत्य पुरूष की न करने से यमदूतों के द्वारा बेल (हथकड़ी) बाँधकर ऊपर यमराज के पास ले जाया गया। नरक में डाला गया। इसलिए हे मानव! अशुभ कर्मों से डर, सत्य भक्ति गुरू धारण करके कर।
शंका समाधान करते हुए परमेश्वर कबीर जी ने सत्संग में बताया कि आध्यात्मिक ज्ञान के न होने के कारण अच्छे व्यक्तियों से भी पाप हुए हैं। जब उन्होंने सत्संग सुना तो सर्व अपराध त्यागकर भक्ति करके अपना कल्याण कराया है। परमात्मा कबीर जी ने बताया कि मेरे पास साधना के वे यथार्थ मंत्रा हैं जो सर्व पापों को नष्ट कर देते हैं। पुण्य बच जाते हैं। (जैसे वर्तमान में वैज्ञानिकों ने ऐसी औषधि खोजी है जो खेती में डालने से घास व खरपतवार को नष्ट कर देती है, फसल सुरक्षित रहती है।) ये मंत्रा मैं अपने लोक से लेकर आया हूँ।
सोहं शब्द हम जग में लाए। सार शब्द हम गुप्त छिपाए।।
(ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 95 मंत्रा 2 में भी प्रमाण है कि ‘‘परमात्मा प्रत्यक्ष प्रकट होकर अपनी अमृतवाणी द्वारा मुक्ति के सत्य मार्ग की प्रेरणा करता है। वह परमात्मा सब देवों का देव यानि सर्व का मालिक भक्ति के गुप्त नामों का आविष्कार करता है।) यदि कोई महापापी भी है, सत्य साधना करने लग जाता है और भविष्य में कोई पाप नहीं करता है तो उसके सर्व पाप समाप्त हो जाते हैं, भक्ति करके अपना कल्याण करा सकता है।
उपरोक्त अमृतवचन सुनकर वह बहन वैश्या जैसे गहरी नींद से जागी हो। कांपने लग गई। घर में ताला लगाकर सत्संग स्थल पर गई। पीछे ही महिलाओं की ओर बैठ गई। सत्संग समाप्त होने के पश्चात् आवाज लगी कि जो दीक्षा लेना चाहता है, वह आगे गुरू देव जी के पास आ जाए। कुछ स्त्राी तथा पुरूष उठकर आगे आए। वह वैश्या भी आई और गुरूदेव जी को अपना परिचय दिया और बताया कि मैंने तो 40 वर्ष की आयु में प्रथम बार ये उपकारी वचन सुनने को मिले हैं। हे परमात्मा! क्या मेरे जैसी पापिन का भी कल्याण संभव है? वैसे तो आप जी ने सर्व समाधान सत्संग में बता दिया, परंतु जब अपने घृणित जीवन की ओर झांकती हूँ तो ग्लानि होती है तथा विश्वास नहीं हो रहा कि मेरे जैसे अपराधी को क्षमा कर दिया जाएगा। परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि:-
कबीर, जब ही सत्यनाम हृदय धरा, भयो पाप को नाश।
जैसे चिनंगी अग्नि की, पडै पुरानै घास।।
भावार्थ:- जैसे करोड़ टन सूखे घास का ढ़ेर लगा हो। यदि उसमें एक तीली माचिस की जलाकर डाल दी जाए तो उस घास को राख बना देती है। फिर हवा चलेगी जो उस राख को भी उड़ाकर ले जाएगी। काम-तमाम हुआ। इसी प्रकार करोड़ों जन्मों के भी पाप क्यों न हों, मेरे सच्चे मंत्रा का जाप उसे जलाकर राख कर देगा। भविष्य में कोई गलती न करना, कल्याण हो जाएगा।
(यजुर्वेद के अध्याय 8 मंत्रा 13 में भी यही प्रमाण है कि परमात्मा अपने भक्त (एनसः एनसः) घोर पापों का नाश कर देता है। जीव का कल्याण कर देता है।)
उस बहन ने पाप का कार्य (वैश्या का धंधा) त्याग दिया। परमात्मा कबीर जी से दीक्षा लेकर मर्यादा का पालन करते हुए आजीवन साधना करके चम्पाकली ने मोक्ष प्राप्त किया।
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परमेश्वर की लीलाए - 1

रंका-बंका की कथा 

रंका (पुरूष) तथा बंका (स्त्राी) परमात्मा के परम भक्त थे। तत्वज्ञान को ठीक से समझा था। उसी आधार से अपना जीवन यापन कर रहे थे। उनकी एक बेटी थी जिसका नाम अबंका था। एक दिन नामदेव भक्त ने अपने गुरू जी से कहा कि गुरूदेव आपके भक्त रंका व बंका बहुत निर्धन हैं। आप उन्हें कुछ धन दे दो तो उनको जंगल से लकडियाँ लाकर शहर में बेचकर निर्वाह न करना पड़े। दोनों जंगल में जाते हैं। लकड़ियाँ चुगकर लाते हैं। भोजन का काम कठिनता से चलता है। गुरूदेव बोले, भाई! मैंने कई बार धन देने की कोशिश की है, परंतु ये सब दान कर देते हैं। दो-तीन बार तो मैं स्वयं वेश बदलकर लकड़ी खरीदने वाला बनकर गया हूँं। उनकी लकड़ियों की कीमत अन्य से सौ गुणा अधिक दी थी। उनकी लकड़ियाँ प्रतिदिन दो-दो आन्ना की बिकती थी। मैंने दस रूपये में खरीदी थी। उन्होंने चार आन्ना रखकर शेष रूपये मेरे को सत्संग में दान कर दिए। अब आप बताओ कि कैसे धन दूँ? भक्त नामदेव जी ने फिर आग्रह किया कि अबकी बार धन देकर देखो, अवश्य लेंगे। गुरू तथा नामदेव जी उस रास्ते पर गए जिस रास्ते से रंका-बंका लकड़ी लेकर जंगल से आते थे। गुरू जी ने रास्ते में सोने (Gold) के बहुत सारे आभूषण डाल दिए जो लाखों रूपयों की कीमत के थे। नामदेव तथा गुरूदेव एक झाड़ के पीछे छिपकर खड़े हो गए। रंका आगे-आगे चल रहा था सिर पर लकडियाँ रखकर तथा उसके पीछे लकडियाँ लेकर बंका दो सौ फुट के अंतर में चल रही थी। भक्त रंका जी ने देखा कि स्वर्ण आभूषण बेशकीमती हैं और बंका नारी जाति है, कहीं आभूषणों को देखकर लालच आ जाए और अपना धर्म-कर्म खराब कर ले। इसलिए पैरों से उन आभूषणों पर मिट्टी डालने लगा। भक्तमति बंका भी पूरे गुरू की चेली थी। उसने देखा कि पतिदेव गहनों पर मिट्टी डाल रहा है, उद्देश्य भी जान गई। आवाज लगाकर बोली कि चलो भक्त जी! क्यों मिट्टी पर मिट्टी डाल रहे हो। बंका जी समझ गए कि इरादे की पक्की है, कच्ची नहीं है। दोनों उस लाखों के धन का उल्लंघन करके नगर को चले गए। गुरू जी ने कहा कि देख लिया भक्त नामदेव जी! भक्त हों तो ऐसे।
एक दिन शाम 4 बजे गुरू जी सत्संग कर रहे थे। सत्संग स्थल रंका जी की झोंपड़ी से चार एकड़ की दूरी पर था। रंका तथा बंका दोनों सत्संग सुनने गए हुए थे। उनकी बेटी अबंका (आयु 19 वर्ष) झोंपड़ी के बारह चारपाई पर बैठी थी। झोंपड़ी में आग लग गई। सब सामान जल गया। अबंका दौड़ी-दौड़ी आई और देखा कि सत्संग चल रहा था। गुरू जी सत्संग सुना रहे थे। श्रोता विशेष ध्यान से सत्संग सुनने में मग्न थे। शांति छायी थी। अबंका ने जोर-जोर से कहा कि माता जी! झोंपड़ी में आग लग गई। सब सामान जल गया। माता बंका उठी और बेटी को एक ओर ले गई और पूछा कि क्या बचा है? बेटी अबंका ने बताया कि एक चारपाई बाहर थी, वही बची है। भक्त रंका भी उठकर आ गया था। दोनों ने कहा कि बेटी! उस चारपाई को भी आग के हवाले करके आजा, सत्संग सुन ले। झोंपड़ी नहीं होती तो आग नहीं लगती, आग नहीं लगती तो सत्संग के वचनों का आनंद भंग नहीं होता। अबंका गई और चारपाई को झोंपड़ी वाली आग में डालकर सत्संग सुनने आ गई। सत्संग के पश्चात् घर गए। उस समय का खाना सत्संग में लंगर में खा लिया था। रात्रि में जली झोंपड़ी के पास एक पेड़ के नीचे बिना बिछाए सो गए। भक्ति करने के लिए वक्त से उठे तो उनके ऊपर सुंदर झोंपड़ी थी तथा सर्व बर्तन तथा आटा-दाल आदि-आदि मिट्टी के घड़ों में भरा था। उसी समय आकाशवाणी हुई कि भक्त परिवार! यह परमात्मा की मेहर है। आप इस झोंपड़ी में रहो, यह आज्ञा है गुरूदेव की। तीनों प्राणियों ने कहा कि जो आज्ञा गुरूदेव! सूर्योदय हुआ तो नगर के व्यक्ति देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि जो झोंपड़ी दूसरे वृक्ष के साथ डली थी, उस पुरानी की राख पड़ी थी। नई झोंपड़ी एक सप्ताह से पहले बन नहीं सकती थी। सबने कहा कि यह तो इनके गुरू जी का चमत्कार है। नगर के लोग देखें और गुरू जी से दीक्षा लेने का संकल्प करने लगे। हजारों नगरवासियों ने दीक्षा ली। (यह सब लीला परमेश्वर कबीर जी ने काशी शहर में प्रकट होने से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व की थी। उस समय भक्त नामदेव जी को भी शरण में लिया था।)
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परमेश्वर (भगवान) कौन है?.....

आज हम भूल वश विभिन्न धर्मो मे बट गए है लेकिन उस परमपिता के लिए आज भी हम एकसमान है,तो फिर आओ जाने वो कौन हे परमात्मा? जिसके बारे हमारे पवित्र सद्ग्रंथ (वेद, कुरान, बाइबल,गुरुग्रंथ साहब) गुणगान करते है



आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पहले कोई भी धर्म या अन्य सम्प्रदाय नहीं था। न हिन्दु, न मुसलिम, न सिक्ख और न ईसाई थे। केवल मानव धर्म था। सभी का एक ही मानव धर्म था और है। लेकिन जैसे-2 कलयुग का प्रभाव बढ़ता गया वैसे-2 हमारे में मत-भेद होता गया। कारण सिर्फ यही रहा कि धार्मिक कुल गुरुओं द्वारा शास्त्रों में लिखी हुई सच्चाई को दबा दिया गया। कारण चाहे स्वार्थ हो या ऊपरी दिखावा। जिसके परिणाम स्वरूप आज एक मानव धर्म के चार धर्म और अन्य अनेक सम्प्रदाएँ बन चुकी हैं। जिसके कारण आपस में मतभेद होना स्वाभाविक ही है। सभी का प्रभु/भगवान/राम/अल्लाह/रब/गोड/खुदा/परमेश्वर एक ही है। ये भाषा भिन्न पर्यायवाची शब्द हैं। सभी मानते हैं कि सबका मालिक एक है लेकिन फिर भी ये अलग-2 धर्म सम्प्रदाएँ क्यों ?

जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा ।
हिन्दु मुसलिम सिक्ख ईसाई, धर्म नहीं कोई न्यारा ।।“
 यह बात बिल्कुल ठीक है कि सबका मालिक/रब/खुदा/अल्लाह/गोड/ राम/परमेश्वर एक ही है जिसका वास्तविक नाम कबीर है और वह अपने सतलोक/सतधाम/सच्चखण्ड में मानव सदृश स्वरूप में आकार में रहता है। लेकिन अब हिन्दु तो कहते हैं कि हमारा राम बड़ा है, मुसलिम कहते हैं कि हमारा अल्लाह बड़ा है, ईसाई कहते हैं कि हमारा ईसामसीह बड़ा और सिक्ख कहते हैं कि हमारे गुरु नानक साहेब जी बड़े हैं। ऐसे कहते हैं जैसे चार नादान बच्चे कहते हैं कि यह मेरा पापा, दूसरा कहेगा यह मेरा पापा है तेरा नहीं है, तीसरा कहेगा यह तो मेरा पिता जी है जो सबसे बड़ा है और फिर चैथा कहेगा कि अरे नहीं नादानों! यह मेरा डैडी है, तुम्हारा नहीं है। जबकि उन चारों का पिता वही एक ही है। इन्हीं नादान बच्चों की तरह आज हमारा मानव समाज लड़ रहा है।
                                ‘‘कोई कहै हमारा राम बड़ा है, कोई कहे खुदाई रे।
                            कोई कहे हमारा ईसामसीह बड़ा, ये बाटा रहे लगाई रे।।‘‘
जबकि हमारे सभी धार्मिक ग्रन्थों व शास्त्रों में उस एक प्रभु/मालिक/रब/खुदा/अल्लाह/ राम/साहेब/गोड/परमेश्वर की प्रत्यक्ष नाम लिख कर महिमा गाई है कि वह एक मालिक/प्रभु कबीर साहेब है जो सतलोक में मानव सदृश स्वरूप में आकार में रहता है।
"सद्ग्रंथों में प्रमाण" 
वेद, गीता, कुरान और गुरु ग्रन्थ साहेब ये सब लगभग मिलते जुलते ही हैं। यजुर्वेद के अ. 5 के श्लोक नं. 32 में, सामवेद के संख्या नं. 1400, 822 में, अथर्ववेद के काण्ड नं. 4 के अनुवाक 1 के श्लोक नं. 7, ऋग्वेद के म. 1 अ. 1 के सुक्त 11 के श्लोक नं. 4 में कबीर नाम लिख कर बताया है कि पूर्ण ब्रह्म कबीर है जो सतलोक में आकार में रहता है। गीता जी चारों वेदों का संक्षिप्त सार है। गीता जी भी उसी सतपुरुष पूर्ण ब्रह्म कबीर की तरफ इशारा करती है। गीता जी के अ. 15 के श्लोक नं. 16.17, अ. 18 के श्लोक नं. 46, 62 अ. 8 के श्लोक नं. 8 से 10 तथा 22 में, अ. 15 के श्लोक नं. 1,2,4 में उसी पूर्ण परमात्मा की भक्ति करने का इशारा किया है। श्री गुरु ग्रन्थ साहेब पृष्ट नं. 24 पर और पृष्ट नं. 721 पर नाम लिख कर कबीर साहेब की महिमा गाई है। इसी प्रकार कुरान और बाईबल एक ही शास्त्र समझो। दोनों लगभग एक ही संदेश देते हैं कि उस कबीर अल्लाह की महिमा ब्यान करो जिसकी शक्ति से ये सब सृष्टी चलायमान हैं। कुरान शरीफ में सूरत फूर्कानि नं. 25 की आयत नं. 52 से 59 तक में कबीरन्, खबीरा, कबीरू आदि शब्द लिख कर उसी एक कबीर अल्लाह की पाकि ब्यान की हुई है कि ऐ पैगम्बर (मुहम्मद)! उस कबीर अल्लाह की पाकि ब्यान करो जो छः दिन में अपनी शक्ति से सृष्टी रच कर सातवें दिन तख्त पर जा बिराजा अर्थात् सतलोक में जा कर विश्राम किया। वह अल्लाह (प्रभु) कबीर है। इसी का प्रमाण बाईबल के अन्दर उत्पत्ति ग्रन्थ में सृष्टी क्रम में  बाईबल के प्रारम्भ में ही सात दिन की रचना में 1:20-2:5 में है।


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